कुर्द अपनी ही ज़मीन पर क्यों हैं तबाह
कुर्दों की जांबाज़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1920 में इराक़ में कुर्दिस्तान की लड़ाई के लिए बने हथियारबंद संगठन का नाम 'पेशमेगा' था जिसका मतलब होता है 'वो लोग जो मौत का सामना करते हैं.'
संयुक्त कुर्दिस्तान को लेकर शुरू हुई लड़ाई आज कई संगठनों में बँट चुकी है. अरब, कुर्दिस्तान और उत्तरी अफ़्रीका उस्मानी हुक़ूमत यानी ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करते थे.
पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद अलग-अलग देश अस्तित्व में आए जिसके बाद कुर्दिस्तान का इलाक़ा आज सीरिया, इराक़, तुर्की, ईरान और अर्मेनिया जैसे देशों में बंट चुका है. आज इन इलाक़ों में रहने वाले कुर्दों की आबादी तकरीबन साढ़े तीन करोड़ है.
इतने इलाक़ों में बँटे कुर्दों का कोई एक केंद्रीय संगठन नहीं है. अलग-अलग देशों में अलग-अलग संगठन कुर्दिस्तान के लिए लड़ रहे हैं. आख़िर इसकी क्या वजह है जो ये सभी संगठन एक मंच पर नहीं आ सके.
इस सवाल पर मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आगा कहते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह इनका अलग-अलग देशों में बँटा होना है.
वो कहते हैं, "ये संगठन अलग-अलग देशों में बँटे हुए हैं. इनकी जद्दोजहद एक होकर कुर्दिस्तान बनाने की है लेकिन इनके आपस में मतभेद हैं. इन लोगों के अलग हुए 100 साल से अधिक हो गए हैं. इस वजह से इनके अपने स्वार्थ पैदा हो गए हैं."
"तुर्की में मौजूद कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) इनका सबसे बड़ा संगठन है जो विचारधारा से मार्क्सवादी हैं और गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे हैं. सीरिया में स्वायत्त राज्य बनाने के लिए वाईपीजी समूह लड़ रहा है और इसको अमरीका से समर्थन हासिल था. तुर्की से लगी सीमा पर कुर्दों का बड़ा हिस्सा है."
"तुर्की का मानना है कि यह वाईपीजी समूह चरमपंथी संगठन है और वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा. उसे लगता है कि वाईपीजी उसके यहां अव्यवस्था फैला सकता है. वाईपीजी को अमरीका समर्थन करता आया था लेकिन अब उसने अपना समर्थन वापस ले लिया है."
कुर्दों को इराक़ के उत्तर पश्चिम में एक स्वायत्त राज्य मिला हुआ है जबकि तुर्की के दक्षिण पूर्व में यह स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं. वहीं, सीरिया के उत्तर-पूर्व में यह अपना शासन चला रहे हैं. ईरान के उत्तर पश्चिम में भी कुर्द हैं लेकिन वहां कुर्दिस्तान के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं चल रहा है.
तुर्की अपने यहां सक्रिय रहे कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी यानी की पीकेके को चरमपंथी संगठन घोषित कर चुका है. तुर्की के साथ ही अमरीका और यूरोपीय यूनियन भी पीकेके को चरमपंथी संगठन मानता है.
इस पर अंकारा की यिल्दिरिम बेयाज़ित विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं, "1974 में अब्दुल्ला ओजलान ने जब पीकेके नामक संगठन बनाया तो इसने हिंसक रुख़ अपनाया. उस वक़्त अब्दुल्ला ओजलान और उसके संगठन ने तुर्की में कई हमले किए जिनमें तक़रीबन 40 हज़ार लोगों की मौतें हुईं. इसके बाद अब्दुल्ला ओजलान भागकर सीरिया चले गए और उन्हें वहां बशर अल असद के पिता हाफ़िज़ उल असद ने पनाह दी. वहां रहकर उन्होंने बहुत सारे संगठन बनाए."
कुर्दिस्तान को लेकर आज सबसे बड़ी लड़ाई सीरिया-तुर्की की सीमा पर मौजूद पीवाईडी और वाईपीजी संगठनों ने छेड़ी हुई है क्योंकि तुर्की में इस समय दो करोड़ कुर्द लोग रहते हैं. तुर्की पीकेके की ही तरह पीवाईडी और वाईपीजी को अपना दुश्मन मानता है.
तुर्की ने साल 2018 में पश्चिमी सीरिया में कुर्दों के नियंत्रण वाले आफ़रिन प्रांत में हमला किया था जिसमें कई आम लोग मारे गए थे और दस हज़ार लोग विस्थापित हुए थे.
आईएस के ख़िलाफ़ सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ॉर्सेज़ (एसडीएफ़) ने अमरीका के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी. एसडीएफ़ में कुर्द और अरब लड़ाके समूह हैं. इन्हीं में से एक वाईपीजी अमरीकी फ़ौज का साथी रहा है लेकिन अब अमरीका ने उत्तर-पूर्व सीरिया से जाने की घोषणा कर दी है.
संयुक्त कुर्दिस्तान को लेकर शुरू हुई लड़ाई आज कई संगठनों में बँट चुकी है. अरब, कुर्दिस्तान और उत्तरी अफ़्रीका उस्मानी हुक़ूमत यानी ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करते थे.
पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद अलग-अलग देश अस्तित्व में आए जिसके बाद कुर्दिस्तान का इलाक़ा आज सीरिया, इराक़, तुर्की, ईरान और अर्मेनिया जैसे देशों में बंट चुका है. आज इन इलाक़ों में रहने वाले कुर्दों की आबादी तकरीबन साढ़े तीन करोड़ है.
इतने इलाक़ों में बँटे कुर्दों का कोई एक केंद्रीय संगठन नहीं है. अलग-अलग देशों में अलग-अलग संगठन कुर्दिस्तान के लिए लड़ रहे हैं. आख़िर इसकी क्या वजह है जो ये सभी संगठन एक मंच पर नहीं आ सके.
इस सवाल पर मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आगा कहते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह इनका अलग-अलग देशों में बँटा होना है.
वो कहते हैं, "ये संगठन अलग-अलग देशों में बँटे हुए हैं. इनकी जद्दोजहद एक होकर कुर्दिस्तान बनाने की है लेकिन इनके आपस में मतभेद हैं. इन लोगों के अलग हुए 100 साल से अधिक हो गए हैं. इस वजह से इनके अपने स्वार्थ पैदा हो गए हैं."
"तुर्की में मौजूद कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) इनका सबसे बड़ा संगठन है जो विचारधारा से मार्क्सवादी हैं और गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे हैं. सीरिया में स्वायत्त राज्य बनाने के लिए वाईपीजी समूह लड़ रहा है और इसको अमरीका से समर्थन हासिल था. तुर्की से लगी सीमा पर कुर्दों का बड़ा हिस्सा है."
"तुर्की का मानना है कि यह वाईपीजी समूह चरमपंथी संगठन है और वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा. उसे लगता है कि वाईपीजी उसके यहां अव्यवस्था फैला सकता है. वाईपीजी को अमरीका समर्थन करता आया था लेकिन अब उसने अपना समर्थन वापस ले लिया है."
कुर्दों को इराक़ के उत्तर पश्चिम में एक स्वायत्त राज्य मिला हुआ है जबकि तुर्की के दक्षिण पूर्व में यह स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं. वहीं, सीरिया के उत्तर-पूर्व में यह अपना शासन चला रहे हैं. ईरान के उत्तर पश्चिम में भी कुर्द हैं लेकिन वहां कुर्दिस्तान के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं चल रहा है.
तुर्की अपने यहां सक्रिय रहे कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी यानी की पीकेके को चरमपंथी संगठन घोषित कर चुका है. तुर्की के साथ ही अमरीका और यूरोपीय यूनियन भी पीकेके को चरमपंथी संगठन मानता है.
इस पर अंकारा की यिल्दिरिम बेयाज़ित विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं, "1974 में अब्दुल्ला ओजलान ने जब पीकेके नामक संगठन बनाया तो इसने हिंसक रुख़ अपनाया. उस वक़्त अब्दुल्ला ओजलान और उसके संगठन ने तुर्की में कई हमले किए जिनमें तक़रीबन 40 हज़ार लोगों की मौतें हुईं. इसके बाद अब्दुल्ला ओजलान भागकर सीरिया चले गए और उन्हें वहां बशर अल असद के पिता हाफ़िज़ उल असद ने पनाह दी. वहां रहकर उन्होंने बहुत सारे संगठन बनाए."
कुर्दिस्तान को लेकर आज सबसे बड़ी लड़ाई सीरिया-तुर्की की सीमा पर मौजूद पीवाईडी और वाईपीजी संगठनों ने छेड़ी हुई है क्योंकि तुर्की में इस समय दो करोड़ कुर्द लोग रहते हैं. तुर्की पीकेके की ही तरह पीवाईडी और वाईपीजी को अपना दुश्मन मानता है.
तुर्की ने साल 2018 में पश्चिमी सीरिया में कुर्दों के नियंत्रण वाले आफ़रिन प्रांत में हमला किया था जिसमें कई आम लोग मारे गए थे और दस हज़ार लोग विस्थापित हुए थे.
आईएस के ख़िलाफ़ सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ॉर्सेज़ (एसडीएफ़) ने अमरीका के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी. एसडीएफ़ में कुर्द और अरब लड़ाके समूह हैं. इन्हीं में से एक वाईपीजी अमरीकी फ़ौज का साथी रहा है लेकिन अब अमरीका ने उत्तर-पूर्व सीरिया से जाने की घोषणा कर दी है.
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